Mufsidat Namaz ऐसे काम करने से जिनसे नमाज़ नहीं हो In Hindi
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Mufsidat Namaz |
नमाज़ के मुफ़सिदात (Mufsidat Namaz) उन चीज़ो को कहते है जिन से नमाज़ फ़ासिद हो है, यानि टूट जाती है मतलब ऐसे काम करना की हालत में जिससे मोमिन मर्द हो या औरत उसकी नमाज़ टूट सकती हैं और उसे लौटाना ज़रूरी होता हैं दोहराना जरुरी होता हैं। इसे नमाज़ के मुफ़सिदात कहते हैं
और जान बुझ कर हो या भूल कर हर सूरत में नमाज़ टूट जाती हैं नमाज़ के मुफ़सिदात (Mufsidat Namaz) हसबे ज़ैल हैं। हमने निचे नमाज़ के मुफ़सिदात (Mufsidat Namaz) बताए हैं हदीस के रौशनी में जो सल्लल्लाहो अलयवासल्लम से साबित हैं
मुफ़सिदाते नमाज़ (Mufsidat Namaz)
- इन चीजों के करने से नमाज़ फासिद हो जाती है ।
- बात करना खाह थोड़ी हो या बहुत कस्दन या भूल कर, नमाज़ में कलाम बात करना जान बुज कर हो या भूल कर थोड़ा हो या बहुत हर सूरत में नमाज़ टूट हैं
- जवाब से सलाम करना या सलाम का जवाब देना
- सलाम करना यानि किसी आदमी को सलाम करने के इरादे से सलाम या अल्लाह हाफिज या सस्सलामु अलैकुम या इसी तरह कोई लफ्ज़ कह देना।
- छींकने वाले के जवाब में यर ह मुकल्लाह कहना
- सलाम का जवाब देना या छींक ने वाले को यारहमुकल्लाह या नमाज़ से बाहर वाले किसी आदमी की दुआ पर आमीन कहना
- रंज की खबर सुन कर इन्ना लिल्लाहि व इन्ना एलैहि राजिऊन पूरा या थोड़ा सा पढ़ना या अच्छी खबर सुन कर अलहन्दु लिल्लाह कहना या अजीब चीज सुनकर सुबहाबल्लाह कहना
- दुःख तकलीफ़, दर्द या रंज की वजह से आह , ओह या उफ़ करना
- अपने इमाम के सिवा किसी दूसरे को लुक़मह देना यानि किसी और शक्श को किरात गलती बताना इससे भी नमाज़ टूट जाती हैं
- क़ुरान शरीफ को नमाज़ की हालत में देख कर पढ़ना, क़ुरान मजीद पहड़ने में बड़ी गलती फ़र्ज़ वाजिब को तर्क करना
- किरअत में ऐसी गलती करना जिससे नमाज़ फासिद हो जाती है ( जिसकी तपसील बड़ी किताबों में लिखी है )
- अमले कसीर मस्लन ऐसा काम करना जिसे देखने वाला गुमान करे कि यह शख्स नमाज़ नहीं पढ़ रहा है मस्लन दोनों हाथों से काम करना
- कस्दन या भूल कर कुछ खाना पीना, खाना पिन इरादे से हो या भूल से। पहले ही से मुंह में कोई चीज़ हो तो चने के बराबर होती फ़ासिद और मुँह के बहार से खाये तो टिल के बराबर होती फ़ासिद होगी
- सीना क़िब्ले से फिर जाना, क़िब्ले की तरफ से बिना मज़बूरी सिनः फेर लेना
- दर्द या मुसीबत की वजह से इस तरह रोना कि आवाज़ में हुरूफ़ निकल जाएं, अल्लाह और जहन्नम की खौफ से ऐसा रोये तो फ़ासिद न होंगी
- नमाज़ में हँसना, बालिग़ आदमी का नमाज़ में क़हक़हा मार कर पूरा मुँह खोल कर आवाज़ से हसना
- इमाम से आगे बढ़ जाना, इमाम खड़े रहने में आगे बढ़ जाना वगैरह .ये नमाज़ के मुफ़रीदात (Namaz Ke Mufsidat) हैं
- दुआ में ऐसी चीज़ मांगना जो आदमियों से मांगी जा ती हो, जैसे या अल्लाह मुझे आज सौ 100 रूपए दे दे
- सत्तर खुल जाने की हालत में एक रुक्न यानि तीन बार सुभान रब्बियल आला कहने की मिक़्दार ठरना
- नापाक जहग पर सजदा करना
- दो साफा के मिक़्दार के बराबर चलना
- अमले कसीर करना यानि कोई ऐसा काम करना जिन से देख ने वाले ये समझे की ये आदमी नमाज़ नहीं पढ़ रहा हैं मसलन दो हाथ से टोपी दुरुस्त करना या दोनों हाथ छोड़ कर आस्तीन उतरना ये नमाज़ के मुफ़रीदात (Namaz Ke Mufsidat) हैं
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( तिरमीज़ी )
जमाअत व इमामत का बयान
जमाअत की बड़ी ताकीद आई है और इसका सवाब बहुत ज़्यादा है यहाँ तक कि वे जमाअत की नमाज़ से जमाअत वाली नमाज़ का सवाब २७ गुना है ।
( मिश्कात जिल्द १ सम्हा९ ५ )
मसहालहः
मर्दो को जमाअत के साथ नमाज़ पढ़ना वाजिब है बिला उन एक बार भी जमाअत छोड़ने वाला गुनहगार और सज़ा के लाइक है और जमाअत छोड़ने की आदत डालने वाला फासिक है जिसकी गवाही कुबूल नहीं की जायेगी ;
( रूददुल मुहतार )
मसहालहः
जम्आ व इदैन में जमाअत शर्त है यानी वगैर जमाअत यह नमाजें होंगी ही नहीं , तरावीह में जमाअत सुन्नते किफाया है यानी मुहल्ला के कुछ लोगों ने जमाअत से पढ़ी तो सबके जिम्मा से जमाअत छोड्ने की बुराई जाती रही और अगर सब ने जमाअत छोड़ दी तो सबने बरा किया रमज़ान शरीफ में वित्र को जमाअत से पढ़ना मुस्तहब है इसके अलावा सुन्नतों और नफ्लों में जमाअत मकरूह है
( रूदुल मुहतार जिल्दश्सपहा ३७१ )
मसहालहः
अकेला मुक्तदी मर्द अगरचे लड़का हो इमाम के बराबर दाहिनी तरफ खड़ा हो बाएं तरफ या पीछे खड़ा होना मकरूह है दो मुक्तदी हों तो पीछे खड़े हों इमाम के बराबर खड़ा होना मकरूहे तन्जीही है दो से ज़्यादा का इमाम के बगल में खड़ा होना मकरूहे तहरीमी है ।
( दुरी मुख्तार जिल्द १ सफ्हा ३ ९ १ )
मसहालहः
पहली सफ में और इमाम के करीब खड़ा होना अफ़जल है लेकिन जनाजा में पिछली सफ अफजल है
( दुरै मुख्तार सम्हा ३८३ ) ,
ये नमाज़ के मुफ़रीदात (Namaz Ke Mufsidat) हैं
मसहालहः
इमाम होने का सबसे ज्यादा हकदार वह शख्स है जो नमाज़ व तिहारत वगैरह के अहकाम सबसे ज्यादा जानता हो फिर वह शख्स जो कित का इल्प ज़्यादा रखता हो अगर कई शख्स इन बातों में बराबर हों तो वह शख्स ज़्यादा हक़दार है जो ज़्यादा मुत्तकी हो अगर इस में भी बराबर हों तो ज़्यादा उम्र वाला फिर जिसके अख्लाक ज्यादा अच्छे हों फिर ज्यादा तहज्जुदगुजार गर्ज कि चन्द आदमी बराबर दर्जे के हों तो उनमें जो शरयी हैसियत से फौकियत रखता हो वही ज़्यादा हकदार है ।
मसहालहः
फासिके मोअलिन जैसे शराबी , जिनाकार - जुवाड़ी , सुदखोर , दाढ़ी मुड़ाने वाला या कटाकर एक मुश्त से कम रखने वाला इन लोगों को इमाम बनाना गुनाह है और इन लोगों के पीछे नमाज़ मकरूहे तहरीमी है और नमाज़ को दुहराना वाजिब है
मसहालहः
कादियानी , राफ्ज़ी , खार्जी , वहाबी और दूसरे तमाम बद मजहबों के पीछे नमाज़ पढ़ना नाजाइज व गुनाह है अगर गलती से पढ़ली तो फिर से पढ़े अगर दुबारा नहीं पढ़ेगातों गुनहगार होगा
ये नमाज़ के मुफ़रीदात (Mufsidat Namaz) हैं

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